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Donations to Bharat Vikas Parishad are eligible for income tax exemption under section 80-G of Income Tax Act. Donations may kindly be sent by cheque / demand draft in favour of Bharat Vikas Parishad, Bharat Vikas Bhawan, BD Block, Behind Power House, Pitampura, Delhi-110034.


 
 

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Articles on Bharat Vikas Parishad
 

भारत विकास परिषद्
डा॰ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी

हम सबके लिए भारत विकास परिषद् एक स्वप्न भी है और स्वप्न का आकार भी। यह एक संस्था भी है और आन्दोलन भी। यह संस्था भारतीय दृष्टि से उपजा हुआ, सम्पर्क से अभिसिंचित, सहयोग के हाथें से निर्मित, संस्कार के हृदय से स्पन्दित, सेवा की अंजुरी में समर्पण का नैवेद्य है।

स्मृतियों के वातायन से देखता हूँ तो आज से लगभग 40 वर्ष पूर्व की एक संध्या समय की परत मेरे आँखों के सामने उभरती है।  लाला  हंसराज जी ने मुझे एक प्रीतिभोज में मुख्य अतिथि मनोनीत किया और कहा कि मुझे इस संस्था को दिशा बोध देना है। तब मैं एक निर्दलीय सासंद (सदस्य, तीसरी लोक सभा) था।  लाला जी और मेरे बीच प्रगाढ़ स्नेह संबंध था। भारतीय संस्कृति के प्रति मेरी आस्था और प्रतिबद्धता ही उस संबंध का अंकुर और उत्स था। मैंने गंभीर और परिहास के मिश्रित लहजे में आदरणीय  लाला जी को उस संध्या में पूछा कि मधुरता से अपना भाषण परोसूँ या कुछ सा़फगोई भी। ठहाका लगाकर लाला हंसराज जी ने कहा, केवल मीठा खाकर भोजन का आनन्द कैसे मिलेगा। तब मैंने अपने भाषण में भारतीय संस्कृति और विकास के अनेकानेक आयामों की चर्चा करने के बाद उपसंहार में कहा कि आप इसे अन्यथा न लें तो मैं कहना चाहूँगा कि राजधानी की एक अट्टालिका की छत्त पर बैठ कर, प्रीतिभोज के बाद, सभा विसर्जीत कर देने में भारत और भारत का विकास कैसे सार्थक और अग्रगामी होगा। मैंने तब लाला जी एवं डा॰ सूरज प्रकाश जी की तरफ मुखातिब होकर कहा कि भारत के विकास की तीर्थयात्रा में समूचे भारत के सपनों और संकल्पों को जोड़ना होगा, भारत विकास परिषद् को भारतव्यापी बनाना होगा, सम्पर्क के स्रोत से भारतीय जनशक्ति की गंगा को समर्पण तक ले जाने के लिए भारत विकास परिषद् को भगीरथ बन कर समर्पित अभियान और आन्दोलन का अश्वमेघ यज्ञ करना होगा। मुझे अब भी याद है, मैंने इस संध्या में कविवर जयशंकर प्रसाद की इन पंक्तियों को सुनाकर अपने वक्तव्य को विराम दिया थाः-

  हिमाद्रि तुंग श्रृंग से,
प्रबुद्ध शुद्ध भारती,
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला,
स्वतंत्रता पुकारती,
अमर्त्य वीर पुत्र हो।
बढ़े चलो, बढ़े चलो।।
 

 लाला हंसराज जी उठ खड़े हुए, मुझे स्नेहातिरेक से आलिंगन किया और कहा, अब आपने हमें नई दिशा दी है, तो नया विधान भी बनाइए और इस नये राष्ट्रीय प्रवर्तन की बागडोर संभालिए। भाई डा॰ सूरज प्रकाश गद्-गद् होकर बोले, हम आज ही संकल्प लेते हैं कि आप का यह सपना साकार करेंगे। और फिर तत्काल पूछा, बताइए मैं कल कब आपके पास आऊँ।

उस दिन के बाद डा॰ सूरज प्रकाश जी से एवं अन्य प्रारंभिक भारत विकास पार्षदों से मेरे जो अन्तरंग संबंध बने, जिस प्रकार वो मुझे भारत विकास परिषद् के हर तार में धागों की तरह बुनते गये, जिस प्रकार भारत विकास परिषद् से मेरा एकात्म भाव संवर्धित होता रहा, वह मेरे जीवन में एक सार्थक आत्मीयता की अविस्मरणीय कथा है। डा॰ सूरज प्रकाश जी के अद्वितीय कर्मयोग के पद्चिन्हों का अनुसरण किया है सभी कार्यकर्ताओं ने, किन्तु प्यारे लाल राही जी की निष्ठा ने परिषद् के लिए नई राहें, नए राजपथ ओर जनपथ निर्माण किए। स्व॰ श्री न्यायमूर्ति देश पांडे, हमारे आदरणीय श्री जस्टिस हंसराज खन्ना एवं श्री जस्टिस रामा जायस ने सक्षम मार्ग दर्शन किया।

सात वर्ष मैं विदेश में रहा, भारत के राजदूत के रूप में भारत की संस्कृति और उसके विकास की दृष्टि को अभिव्यक्ति देता रहा। इस पूरे समय में भारत विकास परिषद् की स्मृतियाँ मेरे हृदय में धड़कन की तरह प्रतिपल मेरे साथ रही।

मैं ब्रिटेन से लौट कर स्वदेश आया तो भारत विकास परिषद् के विराट्, सुविशाल, भारतव्यापी विस्तार को देखकर विस्मित और उल्लासित हुआ। मैं कृतज्ञता और हर्ष का अनुभव करता हूँ कि विदेशों में एवं भारत के नगर-नगर में आज भारत के सर्वतोमुखी विकास के पवित्र मंत्र की मधुरिम रागिनी सुनाई दे रही है। लगता है भारत के विकास की समग्र दृष्टि एक प्रेरक ऋचा की तरह हमारी राष्ट्रीय चेतना को जोड़ते हुए, जगाते हुए, ‘‘संगच्छध्वम् संवदध्वम् सं वो मनांसि जानताम्’’ का अमृत पाथेय लिए एक नई संचेतना की सृष्टि करने को उद्यत है। इस दृष्टि और उपक्रम का नाम है भारत विकास परिषद्। सम्पर्क से सहयोग, सहयोग से संस्कार, संस्कार से सेवा और सेवा से समर्पण की तीर्थयात्रा का नाम है भारत विकास परिषद्। जो भारत के स्वर्णिम अतीत को हीरक भविष्य के साथ जोड़ने का सेतु-निर्माण करने के लिए कृतशपथ है, उसका नाम है भारत विकास परिषद्।



भारत विकास परिषद् का व्यापक क्षितिज
``भारत विकास परिषद् का क्षितिज इतना व्यापक है कि उसके विकास को एक आयाम में बाँधना कठिन होगा। भारत एक भौगोलिक इकाई है, अत: उसके हिमाच्छादित शिखर, नदी, निर्झर, बन-सम्पत्ति आदि से सौन्दर्य को सुरक्षित रखना भी विकास का कार्य है। उसमें बसने वाले मानव समूह के बुद्धि-हृदय का ऐसा परिष्कार करना कि वह `वसुधैव कुटुम्बकम्´ की भावना को आत्म सात कर सके भी भारत विकास का आयाम है। उसमें सुविधा सम्पन्न ग्राम नगर आदि की स्थापना करना, साहित्य, कला, शिक्षा आदि का विकास करना भी भारत की सेवा है।

उसमें निवास करने वाले मानवों में राष्ट्र चेतना जागृत करना और सत्य, अहिंसा, समता, बन्धुता आदि जीवन मूल्यों की आस्था सम्पन्न करना भी भारत का विकास है। पर इन सबके लिए जो अनिवार्य गुण है, वह दृढ़ संकल्प है, जिसके अभाव में कोई कार्य सम्भव नहीं है। और यह संकल्प सम्पूर्ण जीवनी-शक्ति चाहता है। वह संकल्प इसके सदस्यों को प्राप्त हो, यह शुभ कामना है। शुभास्ते पन्थान: सन्तु!" 

महादेवी, प्रयाग, 3 अप्रैल 1985         



भारत विकास परिषद् क्या है?

भारत विकास परिषद् क्या है? अक्सर इस प्रश्न का उत्तर देते समय कि मैं आजकल क्या कर रही हूँ, मुझे इस प्रश्न से भी रूबरू होना पड़ता है। और उत्तर में यह कहना कि भारत विकास परिषद् एक गैर सरकारी संस्था (N.G.O) है, परिषद् के बारे में कोई सार्थक उत्तर प्रतीत नहीं होता। कम से कम मुझे। प्रश्न पूछने वाला भी शायद इस उत्तर से संतुष्ट नहीं होता। तो भी कुछ और जिज्ञासा उसके मन में उस उत्तर के बाद उठती दिखाई नहीं देती। किन्तु मुझ में अवश्य यह एक छटपटाहट है, कुछ और कहने की अकुलाहट छोड़ जाता है, और मैं अपने आप से ही समझने की चेष्टा करने लगती हूँ कि भारत विकास परिषद् क्या है?

तीन शब्दों से मिल कर बना यह नाम अपने आप में पूरा दर्शन समेटे है। भारत, जैसा कि नाम से ही विदित होता है मात्र कोई भूगोल नहीं है, यह मात्र पृथ्वी का टुकड़ा नहीं है, सागर और पर्वत श्रृंखलाओं का योग मात्र नहीं है। यह कुछ सहस्राब्दियों का इतिहास मात्र भी नहीं है। यह लक्ष्योन्मुखी तथा प्रक्रियोन्मुखी शब्द है। इस शब्द से ही पता लगता है कि यह मूल्यों की समष्टि की ओर निरन्तर अग्रसर होने का नाम है। और इस समष्टि में `भा´ अर्थात् `प्रकाश´ में `रत´ रहने वाला `भारत´ है। जो निरन्तर ज्ञान की साधना में रत रहता है वही भारत है। प्रकाश ज्ञान का बोधक है और अंधकार अज्ञान का। इसी लिये मैंने कहा कि इस शब्द में उद्देश्य और क्रिया दोनों अन्तर्हित हैं। फिर प्रश्न उठता है ज्ञान क्या है? क्या कुछ जानकारियों को एकत्रित कर उन्हें कण्ठस्थ कर कुछ डिगि्रयाँ प्राप्त करने का नाम ज्ञान है? अथवा धनोपार्जन की क्षमता को अधिक से अधिक प्राप्त करने का नाम ज्ञान है? अथवा भौतिकी के कुछ नियमों की जानकारी ज्ञान है, अथवा कुछ प्रकल्पनाओं के आधार पर मानव मस्तिष्क की तर्क शक्ति के विशद खेल का नाम ज्ञान है। संक्षेप में कहें तो भौतिकी, रसायन एवं गणित की जानकारी का नाम ज्ञान है। पूरा विश्व अस्मरणीय काल से लगा हुआ है मानवशरीर की रचना एवं उसमें उत्पन्न होने वाले विकारों की जानकारी एवं उनका निदान ढूँढ़ने में। किन्तु जैसे-जैसे ढूँढ़ते जाते हैं वैसे-वैसे पहेली और उलझती जाती है। आप कहेंगे भारत विकास परिषद् क्या है? इसे समझाने की बात करते-करते मैं इतना विषयान्तर क्यों कर रही हूँ किन्तु वस्तुत: यह इस प्रश्न के उत्तर का केन्द्र है। भारतीय मनीषा ने इन सभी विद्याओं को अप्रमा की श्रेणी में रखा है।

भारतीय चिन्तन परम्परा यहां भी पाश्चात्य परम्परा से भिन्नता रखती है। भारतीय चिन्तन में ज्ञान के भी दो भेद किये हैं: प्रमा एवं अप्रमा। निश्चित एवं यथार्थ ज्ञान को प्रमा कहते हैं। गणितीय ज्ञान में निश्चितता होती है किन्तु यथार्थता नहीं। अत: वह प्रमा नहीं है। दूसरी ओर प्राकृतिक विज्ञानों में यथार्थता एक सीमा तक होती है किन्तु निश्चितता नहीं होती। संशय, स्मृति, तर्क एवं भ्रम ये चारों अप्रमा (मिथ्या ज्ञान) की श्रेणी के अन्तर्गत रखे गये हैं।

अत: हमारी चिन्तन परम्परा में आत्मतत्व के ज्ञान को ही प्रमा की संज्ञा दी गई है। बाह्य जगत का ज्ञान व्यक्ति को अपने स्वत्व को समझने में सहायक नहीं होता। आत्मज्ञान ऐसा ज्ञान है जिसे जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रहता। यह सत् है अर्थात्, चित् है अर्थात् चैतन्य तथा पूर्ण आनन्द स्वरूप है। जिसे जानने के बाद दु:खों से आत्यंतिक एवं एकांतिक निवृत्ति हो जाती है अर्थात् सदा के लिये और निश्चित् रूप से दु:खों से मुक्ति हो जाती है। यही परम पुरुषार्थ है। सांख्य दर्शन ने मोक्ष को इसी रूप में परिभाषित किया है इसी लिये अपने यहाँ कहा गया है, `सा विद्या या विमुक्तये´ विद्या या ज्ञान वह है जो आप को सभी बंधनों से, क्षुद्र स्वार्थ की सीमाओं से, दु:ख और शोक से मुक्त कर दे।

इस ज्ञान की साधना में रत है भारत।

ऐसे भारत की विकास की बात भारत के परिप्रेक्ष्य में ही हो सकती है। हम पश्चिम से उधार लिये हुए विकास के मॉडल की नकल नहीं कर सकते। हमारे लिये विकास का तात्पर्य भौतिक समृद्धि अथवा भौतिक सुख सुविधओं की विपुलता नहीं है। यह सच है कि हमारे अस्तित्व की सब से बाहरी परत भौतिक शरीर है, जो बुद्धि मन तथा इन्द्रिय युक्त है। किन्तु हमारे लिये यह शरीर साधन मूल्य रखता है स्वयं साध्य नहीं है। इसी संदर्भ में शंकराचार्य का एक श्लोक स्मरणीय है:

                                                                                                `पूजा ते विषयोपमोग रचना, निद्रा समाधि स्थिति:।
                                                                         संचार: पदयो प्रदक्षिण विधि, स्तोत्राणि सर्वा गिरो।।
                                                                         यद्यत् कर्म करौमि तत्तदखिलम्, शम्भौ तवाराधनम्´


`अर्थात् इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग भी ऐसा हो मानो वह तुम्हारी ही पूजा है, निद्रा की स्थिति भी तन्द्रा या आलस्य वाली नहीं अपितु समाधि जैसी हो और पद संचलन तुम्हारी प्रदक्षिणा जैसा हो। हे शम्भो मैं जो भी कर्म करूँ वह तुम्हारी आराधना पूजा जैसा हो।´´ कर्म योग की चरम परिणति है। यह और यही हमारे विकास की अवधारणा का चरम लक्ष्य है, यही विकास का भारतीय मॉडल है जहाँ न तो बुद्धि विलास स्वयं साध्य है, न मन और इन्द्रियों की बेलगाम इच्छाओं की शरीर के माध्यम से तृप्ति लक्ष्य है अपितु ये सभी अनुशासित, संयमित हों, आत्मज्ञान की ओर निरन्तर अग्रसित हों ऐसा मनुष्य ही विश्व की समस्त समस्याओं का निदान है।

विकास का यह मॉडल मनुष्य को शेष पशु जगत से पृथक करता है। सम्पूर्ण सृष्टि में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसमें प्रकृति का अतिक्रमण करने की सामर्थ्य  है और इसी लिये उसे मूल्यों के जगत का सृष्टा कहा है और इसी अर्थ में वह स्वतंत्र है अर्थात् वह किसी तंत्र (System) से बंधा नहीं है। वह अपने आप अपना तंत्र हैं। पशु भूख लगने पर, भोजन सामने आते ही उस पर टूट पड़ता है फिर चाहे उसे कितना ही प्रशिक्षित क्यों न किया गया हो। दूसरी ओर भूख न होने पर अथवा रुग्ण होने पर वह कभी भी भोजन की ओर अभिमुख नहीं होता। इसके विपरीत मनुष्य भूख लगने पर भी उपवास रखने का निश्चय कर सकता है तो दूसरी ओर बीमार होने पर भी, भूखा न होने पर भी, सुस्वादु भोजन से लालायित हो भोजन कर सकता है यह सोच कर कि चलो कोई पाचक चूर्ण खा लेंगे। और इसीलिये वह स्वतंत्र है। वह पशु से नीचे गिर सकता है तो देवत्व ही नहीं ईश्वरत्व को भी प्राप्त कर यदि सकता है। परिषद् इसी देव-मानव के निर्माण की प्रक्रिया में रत है। ऐसे मनुष्य की जो `सर्व हिताय लोक हिताय´ समर्पित हो, दूसरे की पीर जिसकी आंखों को नम कर दे। स्वार्थ से परार्थ और फिर परमार्थ तक की यात्रा का नाम विकास है। यही हमारी पहचान है विश्व में, जिसके लिये भारत जाना जाता है। अपनी गरीबी, अपनी बेरोजगारी, अपनी अशिक्षा सबके बावजूद आज भी भारत का जन इसी आदर्श को सर्वोपरि मानता है। इस भारतीय चेतना को फिर से रेखांकित करना, गति देना, इसे विश्व के हर कोने तक पहुंचाना जिस से यह सृष्टि मनोरम बनी रहे, भारत विकास परिषद् का एजेंडा है।

राम और कृष्ण की, बुद्ध और महावीर की, पातंजलि और कणाद की, शंकराचार्य और रामानुज की, रामकृष्ण और विवेकानन्द की एवं दयानन्द की यह पुण्य श्रृंखला अनवरत आगे बढ़ती रहेगी यह हमारा विश्वास और आस्था दोनों ही है। अस्मिता की इसी तीर्थ-यात्रा का नाम भारत विकास परिषद् है और आप और हम इस यात्रा के सहयात्री हैं। रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने एक स्थान पर कहा है :

`अपना प्रश्न पत्र भिन्न है अत: उत्तर भी भिन्न होगा। जीवन और जगत को देखने का हमारा नजरिया भिन्न है और इसीलिये हमारी समस्या दूसरी है, दूसरी ही नहीं व्यापक भी है। अत: निश्चय ही समाधान भी हमारी माटी की गन्ध से ही मिलेंगे और वे समाधान हमारी पहचान होंगे। यदि उन्हें छोड़ दिया तो हम भी यूनान और ग्रीस की तरह पृथ्वी के नक्शे पर गुमनाम हो जायेंगे। आइये हम सब मिल कर प्रभु से प्रार्थना करें कि वह हमें शक्ति दे, भक्ति और समर्पण का भाव दे।´

                                                                                                                                         - डॉ. प्रकाशवती शर्मा
                         
                                                                              भारत विकास परिषद् की उपाध्यक्ष  एवं
    संघ लोक सेवा आयोग की पूर्व सदस्या
(ज्ञान प्रभा, जनवरी-अप्रैल, २००८ अंक से)


Bharat Vikas Parishad - A Complete NGO
Non-Government Organizations are usually divided into three categories or generations. The word generation is used because many NGOs start working in the first category and then develop into the second and third categories.

First generation NGOs directly deliver the services to meet an immediate deficiency or shortage experienced by its beneficiary  population such as the needs for food, health care or shelter. During an emergency such as flood, an earthquake or a war such assistance is urgently required and is delivered according to the funds and staff available with the NGO.

In this category the NGO is the doer while the beneficiary is passive. The relief efforts remain tied to the needs of the people in distress. It is an ad hoc relief and usually no further effect or development is involved. Sometimes the NGOs are formed for this very purpose and are dissolved when the emergency is over.

Second generation NGOs focus their energies on development. This development is of two kinds - first the development of health and educational facilities and strengthening the infrastructure. In villages they introduce improved agriculture practices, impart employment oriented training etc. Mostly they do it with their own resources but with the active help of the village committees, self-help groups etc. Secondly they help in developing the capacities of the people to meet their own needs through self-reliant local action. In this type NGO work there is a partnership between the NGO few towns and small territories. They are unable to work at national or global levels.

The third generations NGOs combine the working strategies of both second and third generation NGOs but they work perpetually and are not constrained by a particular territory. They come forward to help in emergencies like floods, earthquakes, famines etc. They also set-up excellent local units to provide help in medical, educational, environmental fields etc. Going beyond the above two functions, they perform catalytic and foundation like roles along with the role of an operational service provider. The underlying theory of the working of third generation NGOs is grounded in an assumption that a centralized control of resources, prevent essential services from reaching the poor and lead to corruption, delay and exploitation. Moreover, these NGOs try to change the thinking of the people and bring a silent revolution.

Bharat Vikas Parishad is a third generation NGO and much more. It was born out of a first generation NGO, the Citizens Forum, which was formed to assist the 1962 war efforts. It converted itself in the second generation NGO after the war. For four years it was confined to Delhi only. Now that small plant has expanded to become a huge banyan tree. Its branches give local help at the time of disasters like floods, earthquakes, tsunami, super cyclones etc. It is also running excellent institutions like Hospitals, Viklang Kendras, Diagnostic Centers etc. it is also brining mental revolution by imbuing the national spirit and giving Sanskaras to the youth, families and senior citizens. Its branches have spread in almost all the corners of the country. The planning, raising the funds and implementing the projects is done by the branches but under
supervision of the centre. 

It has spread its wings to the foreign shores also and is on the way of becoming a global entity.

(Editorial in Gyan Pabha, April-June,2009)


Bharat Vikas Parishad - On Completion of 44 Years

Forty four years are not a very long period in the life of an organisation like Bharat Vikas Parishad but not so short as well . It is almost a beginning in the life of a nation and more than half in the life of a human being . But for an organization it is a period of some expansion and also a lot of maturity . As is well known the BVP was founded on 10th July , 1963 and the first meeting was held at Marina Hotel Cannaught Place New Delhi with fifteen members in attendance. Its founder Dr. Suraj Prakash was its first Secretary General and Lala Hans Raj Gupta was the first  President. In the beginning it was more of a debating society than a dynamic organization which it is today . Meetings were held regularly and speakers and thinkers of different shades of opinion were invited to speak on different topics and to shed light on current topics .

The first project under Sanskar ,Group Song Competition  was started in 1967 and Dr. Zakhir Hussain , the then President of India gave away  the prizes to the winning teams . In 1968 another break through came in the form of the opening of a branch outside Delhi ,at Dehradun . Till then only one branch was operating in Delhi only . In 1969 a half-yearly magazine NITI was started and only articles by eminent writers on different topics were printed in it . There were no reports or photos of branch activities because there were no branches and no activities worth the name . Gradually the magazine became quarterly and finally became a monthly in the year 1988 .

On completion of 10 years of the Parishad Dr. L. M. Singhvi succeeded L. Hans Raj Gupta as president . He composed the oath of the Parishad and also devised the Logo which contains a lotus with the rising sun . The former is the symbol of  knowledge and the latter depicts the development and prosperity of the Nation . The Mantra from the Upanishad ‘ Tamso Ma Jyotirgamayah’ which means ‘ lead us from darkness to light’ depicts the whole philosophy of the Parishad .

On completion of 20 years i.e. 1983 ,  40 branches were working in different parts of the country .In this very year the first meeting of the National Governing Board was held at Delhi attended by 31 delegates from different parts of the country. By the year 1988 the number of branches crossed the magic figure of 100.

In the year 1990 , the biggest Sewa project of the Parishad , Viklang Sahayata Yojana  was launched at Delhi .Since then this project has made great strides and now 13 Viklang Sahayata Centres are working in the four corners of the country and have provided artificial limbs to more than two lac persons at a cost of more than Rs. 25 crores.

In the year 1991, the organization was in for a great shock as the founder Secretary General Dr. Suraj Prakash passed away suddenly on 2nd February . He was at the helm of the affairs for the last 28 years and made it a great organization from a scratch . Shri P. L. Rahi took over as Secretary General and the succession was quite smooth . The progress of the Parishad was unimpeded and new projects like Bharat Ko Jano , Praudh Sanskar Yojana , Guru Vandan Chhatra Abhinandan , Parivar Sanskar Yojana etc were added under Sanskar mantra . Under Sewa the most prominent are Gram Basti Vikas , Vanvasi Sahayata , Health , Environment and Samuhik Saral Vivah . Relief work worth crores of rupees was done and help given at the time of the Super Cyclone in Orissa , earth quake in Gujarat and Tsunami in T.N., A.P. and Kerala . The number of branches  has swelled to about 1000. A new bilingual  half-yearly magazine GYAN PRABHA has been started which carries articles on various topics by eminent writers .

The latest project ,which has been added is the Excellence Award under which an award of Rs. One lac will be given to some eminent persons every year doing outstanding work in the field of Sanskar or Sewa .

 Thus we have grown substantially , if not fully .There is vast scope for further growth and much remains to be done .But this is only a quantitative expansion which the Parishad has gone in the last 44 years . There is another aspect in which the Parishad has changed and this change we can call Maturity . The founders of organizations , institutions and even nations are usually highly motivated  persons having excellent qualities of leadership . They not only start the organizations but remain at the helm of affairs for very long periods, usually till their death . They dominate the whole scene so much that people come to believe that the organization will not survive without them . Sometimes the person becomes bigger than  the organization and the whole thing collapses as soon as he is removed from the scene .

The founder Secretary General , Dr. Suraj Prakash headed the organisation till his death but he was a leader with rare foresight and made the structure of BVP so strong that it went from strength to strength even after his departure. Of course , credit goes to his successors as well who steered the organization in a creditable manner . Perhaps at the time of the death of the stalwart some fear might be lurking in the minds of his colleagues as to what will become of the organization . Will it survive the loss ? But things have changed now , rules have been amended and the change of guard takes place at regular intervals and nobody has any apprehension about the future .From branch level to the Apex Body the whole organization is working in a democratic manner . New projects are added from time to time and new responsibilities are given to new persons. The old order changes giving place to new but without any break or disruption . This is a happy situation and a sign of maturity.

(Editorial in Niti: July,,2007)



Bharat Vikas Parishad and Other Social Cultural Organisations
 

The June 1989 issue of Niti carried an article in Hindi on this subject by Dr. Suraj Prakash, Secretary General, Bharat Vikas Parishad, which gives an excellent exposition of the Parishad vis a vis other socio-cultural organisations like the Rotary and the Lions and contains some valuable guidelines for members and office-bearers of Parishad.  English version of the same is given hereunder. 

Bharat Vikas Parishad is a non political, socio-cultural service organisation of the elite among the citizens. There are other social organisations of the elite also functioning like the Rotary and the Lions. A member of the Rotary Club cannot become a member of the Lions and vice versa, but no such restriction applies to the membership of the Bharat Vikas Parishad, because it is basically different from the other socio-cultural clubs.

Primarily, Bharat Vikas Parishad is not a 'Club'. It is a 'Council' of the elite, intellectuals and well to do, who have dedicated themselves to the service of the poor, disabled, illiterate and the ignorant by gradually developing in them a sense of responsibility and self confidence which is really the concept of our service to the needy.

The Rotary and other international organisations were born outside India and they generally draw inspiration from sources which are alien. They carry a deep stamp of an alien culture, which has also affected their thinking and activities. The ultimate control of those organsations lies in the hands of people outside India. A big proportion of the funds raised by these organisations goes to foreign lands and is spent at the discretion of the foreigners. A very small proportion of these funds is available for the benefit of people in this country. Outwardly, these clubs have adoped the local and national garb, local language are used and the National Anthem is also sung, yet a feeling of cultural inferiority and subjugation to the tinsel world of the West persists and is discernible all along. On the contrary, Bharat Vikas Parishad is wholly and totally an indigenous organisation, which is intensely nationalistic is outlook. It was conceived and born in India and it draws inspiration from Indian culture and Indian values, for the protection and propagation of which it has been established.

In Bharat Vikas Parishad women have a significant role to play. It is fully conscious of its responsibility for the comprehensive and multifaced development of the society. This cannot be achieved unless it is able to carry along with it the women force of India, who constitute half of our population. Therefore, women enjoy equal status and eligibility for membership in our consitution. In fact, membership is granted not to an individual male or female but jointly to the couple.

The main distinction, however, lies in our ideals, our philosophy, aims, objectives, activities and finally in our way of thinking. The aim of the clubs is essentially social get together and eating and entertainment are naturally integral to it. The Parishad also appreciates the importance of fellowship, without which contact (Sampark) and cooperation (Sahyog) are not possible. But fellowhip in the Parishad is only a means to an end and not the end itself. Therefore, only so much stress need be laid on fellowship as may be necessary to reach out, create contacts and secure cooperation.

Social service is the aim of both the Parishad and the clubs, but the definition of 'Service' is different. Service in Bharat Vikas Parishads denotes working for the total development of the country, protection of the national culture and heritage, revival and propagation of our cultural and moral values and national reconstruction in the light of these values. Naturally, the Parishad should take up such programmes which are likely to have a deep impact on society and country and for the success of its programmes the very mentality of our people needs to be changed. Every programme of the Parishad should aim at bringing about a change in the thinking of people and in this respect it is an idealistic missionary organisation, whose mission needs to be understood properly. Compared to it the social service rendered by the clubs is merely a cosmetic affair which has no deep impact on society. Such superficial service may give a feeling of self-satisfaction to those who are enabled to spend a fraction of their immense wealth in the name of public services, but their real objective is self publicity and self promotion. Hardly a small fraction of the money spent in the name of social service in the clubs reaches the needy who are supposed to be benefitted. There is more publicity than service.

More service than publicity is the watchword of Bharat Vikas Parishad. Publicity of Parishad's activities is necessary, but it has to be watched that self publicity is not carried on in the the guise of Parishad's publicity. The path the Parishad has undertaken to treat is hard to follow. It requires tremendous discipline, self-control and sacrifice, as well as the development of a missionary spirit, which alone can bring about a change in the people's thinking and revive their 'sanskars' and their faith in the ancient values it our motherland. We have to mould ourselves, our ideas and actions so that we are able to rise above narrow-mindedness and work devotedly for the unity, integrity and freedom of our country, and ethical values broadmindedness and liberalism are predominant in everything we do. Constant awareness of the ideals, aim and objects alone can gaurantee the success of our mission.

If our urge for public service is so easily satisfied by cheep and superficial service, the very purpose of Bharat Vikas Parishad will be defeated and it will not be any different from the Lions and Rotary. It was never the intention of the founders of the Parishad to make it  a carbon copy of these clubs. To justify its existence, the Parishad was avenues of genuine service which normally are not available to members of these clubs. It is because of the special avenues of service which the Parishad offers that a large number of Rotarians and Lions of high standing in their respective clubs have been attracted to the Parishad. It is our duty to see that they are not disappointed and they are able to find what they have come to seek. Bharat Vikas Parishad should not be allowed degenerate into an ordinary club and its identity and purity should be preserved at any cost.

 

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