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Public Relations / जन  सम्पर्क 

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सम्पर्क

'सम्पर्क शब्द 'सम+पर+क' का संयोजन है। `सम´ का अर्थ अच्छी तरह से `पर´ का अर्थ `दूसरों के साथ´ तथा `क´ का अर्थ करने से है। इस आधार पर सम्पर्क का आशय व्यक्तियों को जोड़ने, उनको अपने विचारों से अवगत कराने, उनके मन-मस्तिष्क को अपने दृष्टिकोण से प्रभावित करने, उनकी शंकाओं एवं भ्रान्तियों का समाधान करने तथा उन्हें सतत् रूप से अपने साथ जोड़े रखने की कला से है।

सम्पर्क के क्षेत्र - परिषद् की कार्य व्यवस्था की दृष्टि से सम्पर्क को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-आतंरिक सम्पर्क तथा जन- सम्पर्क

(I) आन्तरिक सम्पर्क (Internal Relations) शाखा सदस्यों से लेकर प्रान्तीय एवं केन्द्रीय दायित्वधारियों के साथ सम्पर्क आन्तरिक सम्पर्क का अंग है। इस व्यवस्था में निम्न सम्पर्कों को स्थापित करने तथा उन्हें सतत् रूप से विकसित करने तथा बनाये रखने का प्रयास करना होगा:-

1. सदस्यों के मध्य पारस्परिक परिचय एवं सम्पर्क
- शाखा स्तर पर सदस्यों में समूह भावना विकसित करने, सहयोग के लिए प्रोत्साहित करने तथा पारिवारिक वातावरण का सृजन करने की दृष्टि से यह आवश्यक है कि शाखा के सदस्य एक दूसरे को पहचानें और इसके लिए शाखा स्तर पर सदस्यों की सूची का पते, टेलीफोन नं., जन्म-तिथि, विवाह तिथि इत्यादि सहित प्रकाशन किया जा सकता है। उसमें दम्पति फोटो का प्रकाशन उसे अधिक प्रभावी बना सकता है। शाखा स्तर पर परिवारिक मिलन समारोह एवं भ्रमण कार्यक्रम भी सम्पर्क व्यवस्था को पर्याप्त सुदृढ़ता प्रदान करेंगे।

2. दायित्वधारियों के मध्य सहयोग पूर्ण सम्पर्क - शाखा से लेकर केन्द्र तक प्रत्येक स्तर पर दायित्वधारियों के मध्य सहयोग एवं समन्वयपूर्ण सहयोग की भावना रहनी चाहिए।

3. पदाधिकारियों एवं सदस्यों के मध्य सम्पर्क - यह सम्पर्क द्वि-दिशायी होता है- नीचे से ऊपर एवं ऊपर से नीचे। नीचे से ऊपर के सम्पर्क में जिज्ञासायों का समाधान होता है, कार्य में मनोबल बढ़ता है, सुझावों का सम्प्रेषण होता है तथा कार्य सम्पादन की सूचनाओं की उचित जानकारी ऊपर तक पहुँचती है, जबकि ऊपर से नीचे की ओर के सम्पर्क में मार्गदर्शन मिलता है, संगठन के विभिन्न स्तर की कड़ियाँ मजबूती से जुड़ती हैं तथा परिषद् के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहनपूर्ण वातावरण का सृजन होता है।

4. पुराने सदस्यों एवं पदाधिकारियों के साथ सम्पर्क - हमें सम्पर्क व्यवस्था में इस ओर भी ध्यान देना होगा कि शाखाओं में जो पहले सदस्य रहे हैं उनसे भी सम्पर्क किया जाये। इसमें वे नहीं तो उनके परिवार के व्यक्ति सदस्य के रूप में परिषद् से जुड़ सकते हैं। शाखा एवं प्रान्त स्तरीय उन अधिकारियों से भी सम्पर्क बनाया जाये जो काफी सक्रिय रहे हैं किन्तु किन्हीं कारणों से उदासीन हो गये हैं।


जन-सम्पर्क से आशय
Public relations is the management function that identifies, establishes and maintains mutually beneficial relationship between an organization and the various Sections of the society on whom its success or failure depends.

जन सम्पर्क का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। परिषद् के सन्दर्भ में जन-सम्पर्क की विवेचना को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। (अ) सम्पर्क लक्ष्य, (ब) सम्पर्क व्यवस्थायें तथा (स) सम्पर्क प्रकल्प एवं कार्यक्रम।

सम्पर्क लक्ष्य (Sampark Targets)
1. विशिष्ट व्यक्तिगत सम्पर्क
- प्रत्येक प्रान्त एवं शाखा से यह अपेक्षा की गई है कि वह अपने-अपने क्षेत्रों में विशिष्ट व्यक्तियों से व्यक्तिगत सम्पर्क विकसित करें। इसके अनेक विकल्प हैं - उन्हें अपने कार्यक्रमों में आमंत्रित करना, विशिष्ट अवसरों पर उनसे भेंट करना, अपना साहित्य उन तक पहुँचाना। इसमें राजनीति, प्रशासन, उद्योग, चिकित्सा, शिक्षा, खेलकूद, कला, संगीत इत्यादि से जुड़े व्यक्तित्व हो सकते हैं। इस सम्पर्क से परिषद् के कार्यक्रमों को पर्याप्त महत्व एवं प्रचार मिलेगा तथा राजकीय योजनाओं का भी लाभ मिलेगा। केन्द्रीय स्तर पर वी.वी.आई.पी. की एक विस्तृत सूची तैयार करने की योजना चल रही है, जिससे उन्हें केन्द्रीय स्तर से प्रकाशित `नीति´ या अन्य साहित्य प्रेषित किया जा सके।

इस सन्दर्भ में शाखाओं एवं प्रान्तों को भी अपने भौगोलिक क्षेत्र में ऐसे व्यक्तियों को प्रशंसा एवं बधाई पत्र प्रेषित करने की व्यवस्था करनी चाहिए, जिन्होंने अपने कार्यक्षेत्र में राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान, पुरस्कार, सफलतायें एवं विशिष्ट उपलब्धियाँ अर्जित की हैं।

2. विदेश सम्पर्क - भारतवंशी समस्त विश्व में रह रहे हैं। वे पुण्य भूमि भारत से सदैव लगाव महसूस करते हैं एवं अपनी संस्कृति, ऐतिहासिक विरासत एवं परम्पराओं पर उन्हें गर्व है। वे अपनी मातृभूमि से जुड़े रहना चाहते हैं। भारत विकास परिषद् इस जुड़ाव के लिए एक सेतु की भूमिका निभा सकता है। इस सन्दर्भ में निम्न व्यवस्थायें की जा सकती हैं :-

(i) परिषद् के सदस्यों के विदेशों में रह रहे मित्रों एवं रिश्तेदारों के नाम, पते, ई-मेल सहित सूची तैयार करके केन्द्रीय कार्यालय को प्रेषित करना। ऐसे प्रवासी भारतीयों को नववर्ष, दीपावली, जन्मदिन इत्यादि पर ई-मेल के माध्यम से शुभकामनायें प्रेषित करना।

(ii)  उनके भारत आने और पूर्व-सूचना होने पर उनका स्वागत करना।

(iii)  उन्हें विकास मित्र या विकास रत्न बनने के लिए प्रेरित करना।

(iv)  ग्रामीण विकास, विकलांग पुनर्वास एवं प्राकृतिक आपदा के समय राहत कार्यों में उन्हें वित्तीय सहायता के लिए अभिप्रेरित करना।

3. मीडिया सम्पर्क - वर्तमान समय में `मीडिया´ जन सम्पर्क का सबसे विस्तृत एवं सशक्त माध्यम है। अत: प्रान्तीय एवं शाखा स्तर पर प्रिन्ट तथा इलैक्ट्रोनिक मीडिया से अच्छे सम्पर्क विकसित करके अपने प्रकल्पों एवं कार्यक्रमों के आयोजन से पूर्व एवं आयोजन के पश्चात् जन सामान्य तक पहुँचाने का प्रयास करना चाहिए। राष्ट्रीय समूहगान, राष्ट्रीय संस्कृत समूहगान एवं लोकगीत, भारत को जानो प्रश्नमंच, गुरुवन्दन छात्र अभिनन्दन, विकलांग सहायता शिविर इत्यादि के लिए स्थानीय टी.वी. चैनलों के माध्यम से जीवन्त प्रसारण की व्यवस्था की जा सकती है।

मीडिया सम्पर्क की दृष्टि से वर्ष में कम से कम एक बार प्रेस वार्ता का आयोजन अवश्य करना चाहिए, विशेष रूप से जब आप शाखा या प्रान्तीय स्तर पर कोई वृहद या विशिष्ट कार्यक्रम का आयोजन करने जा रहे हैं या केन्द्र का कोई वरिष्ठ दायित्वधारी आपके यहाँ पहुँच रहा है। इसमें परिषद् से सम्बन्धित साहित्य अवश्य वितरित कराया जाना चाहिए। मीडिया में कार्यक्रम की पूर्व सूचना तथा रिर्पोटिंग के साथ ही प्रकाशन एवं प्रसारण के पश्चात् दूरभाष पर या पत्र द्वारा ध्न्यवाद प्रेषण की व्यवस्था भी विकसित करनी चाहिये।

4. कार्यक्रम सम्बन्धित विशिष्ट सम्पर्क - इसमें स्कूलों एवं कॉलेजों में आयोजित किये जाने वाले कार्यक्रमों की दृष्टि से उनके प्राचार्यों अथवा प्रतिनिधियों के साथ सम्पर्क, स्वास्थ्य/नेत्र परीक्षण की दृष्टि से सम्बन्धित डॉक्टरों से सम्पर्क, निर्णायकों की दृष्टि से विशिष्ट योग्यता एवं अनुभव वाले व्यक्तियों से सम्पर्क इत्यादि शामिल है।

सम्पर्क व्यवस्थायें
परिषद् में सम्पर्क व्यवस्थायों कि दृष्टि से व्यापक रूप रेखा बनायी गई जो निम्न प्रकार हैं:-

1. साहित्य प्रकाशन - केन्द्रीय स्तर पर नियमित प्रकाशन के रूप में मासिक पत्रिका `नीति´ तथा त्रैमासिक पत्रिका `ज्ञान प्रभा´ का प्रकाशन किया जा रहा है। परिषद् का संविधान एवं नियमावली प्रकाशित की गई है। परिषद् के परिचय एवं विभिन्न प्रकल्पों के सम्बन्ध में पैम्फलैट तथा पुस्तिकायें प्रकाशित की गई हैं। इसके अतिरिक्त अन्य प्रकाशनों में परिषद् के स्थायी प्रकल्प, भारत विकास परिषद्-प्रगति गाथा, चेतना के स्वर, राष्ट्रगीतिका, भारत को जानो, गुरु वन्दन छात्रा अभिनन्दन, शाखा स्थापना, ओजस्विता के दीप इत्यादि उल्लेखनीय हैं। शाखा एवं प्रान्त स्तर पर भी पत्रिकाओं, स्मारिकाओं तथा निर्देशिकाओं का प्रकाशन किया जा रहा है।

2. वैबसाइट - केन्द्रीय स्तर पर परिषद् की अत्यन्त प्रभावी एवं सूचनाप्रद वैबसाइट www.bvpindia.com विकसित की गई है जो निरन्तर अपडेट की जाती है। आप anything  and for everything  के लिए वैबसाइट को देख सकते हैं।

3. संगठनात्मक व्यवस्थायें - परिषद् के सभी स्तरों पर `सम्पर्क´ की दृष्टि से व्यापक व्यवस्थायें की गई हैं। केन्द्रीय स्तर पर एक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं एक राष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री को सम्पर्क का विशिष्ट उत्तरदायित्व दिये जाने के साथ ही प्रकाशन एवं सैमीनार के लिये प्रोजेक्ट समिति चेरमैन तथा प्रकाशन-वैबसाइट, प्रचार एवं जन-सम्पर्क के लिए राष्ट्रीय मंत्रियों का मनोनयन किया गया है। जोनल स्तर पर जोनल सम्पर्क प्रमुख के मनोनयन की व्यवस्था है। प्रान्तों से भी अपेक्षा की गई है कि वे सम्पर्क संयोजक नियुक्त करें।

सम्पर्क प्रकल्प एवं कार्यक्रम
1. संस्कृति सप्ताह
- भारत विकास परिषद् का यह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण जन-सम्पर्क प्रकल्प है, जिसे संस्कृति सप्ताह/विकास सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य जन-सामान्य में परिषद् के क्रियाकलापों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना है।

2. परिषद् स्थापना दिवस एवं प्रतिभा सम्मान समारोह - एक नये रूप में जन-सम्पर्क का यह प्रकल्प कुछ वर्ष पूर्व प्रारम्भ किया गया है। इसमें सदस्यों के साथ ही जन-सामान्य को परिषद् की स्थापना की पृष्ठभूमि तथा विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाओं को सम्मानित किया जाता है।

3. सैमीनार - सम-सामयिक विषयों पर विशेषज्ञों के प्रस्तुतिकरण के आधार पर चिन्तन-मनन, दिशा-निर्देशन एवं जन-अनुभूति को प्रभावित करने की दृष्टि से यह प्रकल्प प्रारम्भ किया गया है तथा इसका आयोजन शाखा, प्रान्त अथवा राष्ट्रीय किसी स्तर पर भी हो सकता है।

4. उत्कृष्टता सम्मान पुरस्कार - जन-सम्पर्क को विस्तृत करने की दृष्टि से यह प्रकल्प वर्ष 2006-07 से प्रारम्भ किया गया है। इसमें परिषद् के संस्थापक राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. सूरज प्रकाश की स्मृति में उत्कृष्टता सम्मान पुरस्कार दिया जाता है। सत्र 2006-07 में यह पुरस्कार संस्कारों के क्षेत्र में तथा 2007-08 में सेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिये दिया गया था। 2008-09 के लिए यह पुरस्कार पर्यावरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिये दिया जायेगा।

विकास रत्न एवं विकास मित्र - परिषद् के सदस्यों एवं गैर-सदस्यों दोनों को परिषद् के साथ स्थायी रूप से जोड़ने की दृष्टि से विकास रत्न एवं विकास मित्र योजनायें चलायी गयी हैं, जिनमें क्रमश: एक लाख रु. तथा 5,100रु. का योगदान करना होता है तथा कोष में एकत्रित राशि राहत कार्यों के लिए प्रयुक्त की जाती है।

स्थायी प्रकल्प - ये प्रकल्प भी जन-सम्पर्क के प्रभावशाली उपकरण हैं।

उपर्युक्त के अतिरिक्त समग्र ग्रामीण विकास तथा प्राकृतिक आपदाओं के समय परिषद् द्वारा राहत कार्यों में भी परिषद् के जन सम्पर्क प्रकल्प को प्रभावी बनाते हैं।

 


 
 

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