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Vanvasi Bandu performing their traditional dance
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हमारे देश में वनवासी/आदिवासी बन्धुओं की कुल संख्या 8 करोड़ से अधिक है। इनमें
से 27% वनवासी उत्तर पूर्व के प्रान्तों (नागालैण्ड, मेघालय, अरुणांचल प्रदेश, असम
इत्यादि) में, 50%, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड एवं गुजरात
में तथा शेष अन्य प्रान्तों में रहते हैं। ये लोग लगभग डेढ़ लाख गाँवों में बिखरे
हुए हैं एवं ये गाँव पहाड़ियों, जंगलों, रेगिस्तानों एवं दुर्गम स्थानों पर स्थित
हैं। अधिकतर गाँव कच्ची झोपड़ियों के समूह मात्र हैं जहाँ पक्की सड़कें, बिजली, पानी
का नितान्त अभाव है। स्वास्थ्य एवं शिक्षा की सुविधाओं से यहाँ के निवासी नितान्त
वंचित हैं वनवासी/आदिवासी दृढ़ चरित्र वाले एवं सीधे-सादे लोग होते हैं किन्तु
शिक्षा के अभाव एवं प्रगित से दूर होने के कारण अंध विश्वासों की दुनिया मं जीते
हैं।
विदेशी
धार्मिक संस्थाएं भी इस स्थिति का लाभ उठाती हैं एवं धर्म परिवर्तन ने
अलगाववादी आन्दोलनों को जन्म दिया है।
विकास के आधुनिक मॉडल ने वनवासियों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। सडकें, डैम,
कारखाने इत्यादि के निर्माण के लिए इन्हें उजाड़ दिया गया है। पुनर्वास की योजनाएं
केवल कागजों पर हैं एवं भ्रष्टाचार में डूबी हुई हैं। इनकी जीविका के स्रोत, वनों
का विनाश तेजी से हो रहा है। अत: जहाँ एक ओर प्रगति हो रही है वहाँ वनवासी अवगति के
गर्त में ढकेले जा रहे हैं।
भारत को स्वतंत्रता प्राप्त किये हुए 62 वर्ष बीत चुके हैं किन्तु वनवासियों में 84
प्रतिशत पुरुष एवं 95 प्रतिशत महिलाएं निरक्षर हैं। इनकी 95 प्रतिशत आबादी
स्वास्थ्य सुविधाओं तथा 90 प्रतिशत बिजली के प्रकाश से वंचित हैं।
वनवासियों की इस शोचनीय स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए ही वनवासी सहायता योजना
प्रारम्भ की गई है। इस योजना के उद्देश्य निम्न प्रकार हैं:-
-
वनवासियों के हस्तशिल्प एवं अन्य कारीगरी की संरक्षित रखने तथा उनकी कुशलता बढ़ाने
में सहायता करना।
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स्वयं एवं अन्य संगठनों, जो कि इसी प्रकार के कार्यक्रमों में लगे हुए हैं, उनसे
सम्पर्क स्थापित करके स्वास्थ, शिक्षा, रोजगार इत्यादि के क्षेत्रों में नव निर्माण
करना एवं पुराने प्रकल्पों की
आर्थिक सहायता करना।
उत्तर-पूर्व के प्रान्तों को इस योजना के अन्तर्गत 50 लाख रुपया
वार्षिक सहायता दी
जाती है। बोंगाई गाँव (असम) में कांची श्री शंकर मेडिकल सेन्टर के नाम से एक
अस्पताल बनाया जा रहा है जहाँ अनेक रोगों की विशेषज्ञता पूर्ण चिकित्सा की जायेगी।
यह 30 बिस्तरों वाला अस्पताल
होंगे एवं इसकी कुल लागत एक करोड़ रुपये होगी। इस समय
इसकी चाहरदीवारी, गेट तथा वाह्य रोगी विभाग का कार्य पूर्ण हो चुका है। नेत्र
चिकित्सा विभाग निर्माणधीन है।
दूसरे प्रान्तों में भी इसी प्रकार के प्रकल्पों पर कार्य चल रहा है एवं कम से कम
50 लाख रुपये वार्षिक खर्च किये जा रहे
हैं।
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अपील
उदारमना एवं सेवाभाव रखने वाले उद्योगपतियों, व्यवसायियों एवं सम्पन्न व्यक्तियों
से इस योजना हेतु मुक्त हस्त से दान देने की अपील की जाती है।
भारत विकास परिषद् ने निम्न प्रकल्पों को अंगीकृत करने का निर्णय लिया है। नीचे लिखि
तालिका में प्रकल्प का नाम, उनकी संख्या एवं प्रत्येक प्रकल्प के लिए आवश्यक धन राशि
दी जा रही है।
प्रत्येक प्रकल्प पर दान दाता का नाम अंकित किया जायेगा एवं यदि वे उस स्थान पर
स्वयं आना चाहेंगे तो उनका सहर्ष एवं सम्मानपूर्ण स्वागत किया जायेगा।
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प्रकल्प |
अंगीकृत प्रकल्पों की संख्या |
प्रत्येक प्रकल्प का वार्षिक व्यय |
- लड़के
तथा लड़कियों के लिए छात्रावास।
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6
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2,00,000 |
-
बोंगाई गाँव अस्पताल में कमरें, शल्य चिकित्सा
कक्ष एवं स्पेशल वार्ड का निर्माण
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3,00,000 |
-
चिकित्सा उपकरणों से सुसज्जित केन
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50
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50,000
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विधार्थियों के लिए छात्रावास
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1
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6,000 |
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15,000 |
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24
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12,000 |
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1
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1,25,000 |
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2,00,000 |
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1 |
6,000 |
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50
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5,500 |
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2
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75,000 |
-
तीरन्दाजी प्रशिक्षण केन्द्र
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5 |
75,000 |
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21,000 |
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2
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15,000 |
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1
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1,50,000 |
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1
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25,000 |
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12
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18,000 |
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2
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25,000 |
उपकरणों का दान
वनवासी क्षेत्रों के विकास एवं वहाँ के निवासियों की सहायता हेतु नकद राशि के
अतिरिक्त निम्न सामान की भी आवश्यकता है:-
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जीप, चिकित्सा वाहन एवं मोटर साईकिल, बुनाई एवं सिलाई मशीनें तथा करघे।
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कम्प्यूटर तथा उसके सहायक उपकरण।
दान दी गई राशि आयकर अधिनियम की धरा 80 जी में कर मुक्त है।
चैक तथा ड्राफ्ट भारत
विकास परिषद् के नाम से जारी किये जायें एवं जो दिल्ली में देय हो।
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